गाय की वास्तविकता — ईद की भेंट
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जनाब, फिर वही तहज़ीब की महफ़िल सजी है,
लबों पे मोहब्बत, दिलों में कैसी ख़ुशी है?
कोई भाईचारे का पैग़ाम सुनाता फिरता है,
कोई सेकुलरिज़्म का परचम उठाता फिरता है।
दावत की थाली में रिश्तों का नमक रखा गया,
और यक़ीन का क़त्ल बड़े अदब से किया गया।
कहीं जाम-ए-मोहब्बत, कहीं अमन की बात हुई,
मगर पर्दों के पीछे कुछ और ही सौग़ात हुई।
कहते हैं कई जगह ऐसे इल्ज़ाम भी आए,
बकरे के नाम पर गऊ के और ही निवाले खिलाए।
दोस्ती, जिम, महफ़िल, भाईचारे के बहाने,
भोले लोग फँसते रहे मीठे-मीठे अफ़साने।
गंगा-जमुनी तहज़ीब का कितना हसीं नारा था,
मगर भरोसे के सीने में छुपा खंजर सारा था।
जिसे लोग मोहब्बत की दावत समझते रहे,
कुछ चेहरे उसे ख़ामोशी से सियासत कहते रहे।
वाह रे दौर-ए-वफ़ा, वाह रे अदब की कहानी,
चेहरे पे इंसानियत, अंदर चालें पुरानी।
यहाँ सच बोलना भी अब गुनाह माना जाता है,
और हर शक़ को नफ़रत का नाम दिया जाता है।
ईद की भेंट में फिर सवालों का दौर आया,
किसने क्या परोसा — ये सच कहाँ सामने आया?
*बस इतना समझ लो ऐ तहज़ीब के रखवालों,*
*हर मुस्कुराता चेहरा हमेशा साफ़ नहीं होता जनाबों।*

