# **जब कौम के मुफ़लिस रोते हों और चैन से हाकिम सोते हों**
1 min read# **जब कौम के मुफ़लिस रोते हों और चैन से हाकिम सोते हों**
### *लेखक: यूसुफ़ राना*
लोकतंत्र केवल सरकारें बनाने, मंत्री पदों का बंटवारा करने या बहुमत साबित करने का नाम नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ उन चेहरों पर मुस्कान लौटाना है, जिनकी आँखों में भूख, बेबसी और अभाव ने स्थायी डेरा डाल रखा है। सत्ता का असली सौंदर्य जनसेवा में है, लेकिन जब राजनीति जनता की चौखट से उठकर केवल सत्ता के गलियारों तक सिमट जाती है, तब सेवा पीछे छूट जाती है और कुर्सी ही राजनीति का उद्देश्य बन जाती है।
महाराष्ट्र आज ठीक इसी दौर से गुजर रहा है। एक ओर राजनीतिक दलों में टूट-फूट, नेताओं की निष्ठाओं का बदलना, सत्ता की नई समीकरणें, मंत्री पदों की दौड़ और आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति है, तो दूसरी ओर राज्य का आम नागरिक अपनी बुनियादी ज़रूरतों के लिए संघर्ष कर रहा है। सत्ता के गलियारों में जोड़-तोड़ का खेल जारी है, जबकि खेत-खलिहानों, कारखानों और बस्तियों में ज़िंदगी अपने दर्द के साथ संघर्ष कर रही है।
विदर्भ और मराठवाड़ा का किसान आज भी कर्ज़, सूखा, बेमौसम बारिश और बढ़ती लागत के बोझ तले दबा हुआ है। हर किसान की आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मौत नहीं होती, बल्कि शासन और नीतियों पर एक मौन आरोप-पत्र होती है। यह सवाल उठाती है कि विकास के दावों के बीच अन्नदाता आखिर इतना अकेला क्यों है?
मालेगांव, भिवंडी और इचलकरंजी जैसे शहर, जो कभी पावरलूम उद्योग की पहचान थे, आज गंभीर संकट से जूझ रहे हैं। बिजली की बढ़ती दरें, कच्चे माल की महंगाई, सस्ते आयातित कपड़ों की प्रतिस्पर्धा, घटती मांग और सरकारी उदासीनता ने हजारों पावरलूम इकाइयों को बंद होने की कगार पर ला खड़ा किया है। लाखों मजदूरों के घरों का चूल्हा इसी उद्योग से जलता है, लेकिन उनकी आवाज़ राजनीतिक शोर में कहीं दबकर रह गई है।
राज्य का युवा रोजगार की तलाश में भटक रहा है। मध्यम वर्ग महंगाई से परेशान है। बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित परिवार आज भी राहत और पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन राजनीतिक नेतृत्व की ऊर्जा जनता की समस्याओं के समाधान के बजाय एक-दूसरे के विधायक और सांसद तोड़ने, बहुमत साबित करने और सत्ता के नए समीकरण बनाने में खर्च हो रही है।
लोकतंत्र में राजनीतिक मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका उद्देश्य जनता का हित होना चाहिए, केवल सत्ता प्राप्त करना नहीं। जब राजनीति जनता से दूर हो जाती है, तब संसद और विधानसभाएँ तो आबाद रहती हैं, लेकिन समाज भीतर से उजड़ने लगता है।
सरकार से भी प्रश्न है और विपक्ष से भी—आख़िर वह दिन कब आएगा जब किसान की आत्महत्या, पावरलूम मजदूर की बेरोज़गारी, युवा की निराशा, गरीब की भूख और आम आदमी की पीड़ा, राजनीतिक दल-बदल और मंत्री पदों की दौड़ से अधिक महत्वपूर्ण मानी जाएगी?
राज्य केवल चौड़ी सड़कों, ऊँची इमारतों और विकास के विज्ञापनों से मजबूत नहीं बनते। वे न्याय, रोजगार, संवेदनशील शासन और जनता के विश्वास से मजबूत होते हैं। इतिहास गवाह है कि जो शासन जनता के आँसुओं से बेखबर हो जाता है, उसका वैभव अधिक समय तक टिक नहीं पाता।
आज समय की मांग है कि राजनीति को फिर से जनता के दरवाज़े तक लाया जाए। सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया जाए और विकास का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाया जाए। क्योंकि जब तक राजनीति का केंद्र केवल सत्ता रहेगी, जनता हाशिए पर ही खड़ी रहेगी। लेकिन जिस दिन राजनीति का केंद्र जनता बन जाएगी, उसी दिन लोकतंत्र अपने वास्तविक अर्थों में जीवंत, सशक्त और सार्थक दिखाई देगा।
**कबीर की पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती है—**
**”दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवे,**
**सुखिया सब संसार है, खाए और सोवे।”**


