विपक्ष कबतक देश को गुमराह करता रहेगा..?: भवानजी
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भाजपा के वरिष्ठ नेता और मुंबई के पूर्व डेप्युटी मेयर बाबुभाई भवानजी ने एक प्रसिद्धि पत्र मे बताया कि कबतक विपक्ष देश को गुमराह करता रहेगा, संसद न चलने दे के समय और पैईसे की बरबादी एक मात्र उड़ेस रह गया है क्या..? इस विषय को लेकर भवानजी कांग्रेस का कारनामे का जन जागृति अभियान चलाएंगे
भवानजी ने कहा है कि कांग्रेस पार्टी तो डॉ. बीआर आंबेडकर को संविधान सभा में भी नहीं जाने देना चाहती थी, उन्हें इस सभा में शामिल करने का श्रेय उनके मित्र जोगिंदर नाथ मंडल को जाता है.
पिछले दिनों संसद मे अम्बेडकर पर छिड़े विवाद पर आज भवानजी ने कहा कि कांग्रेस के नेताओं को बाबा साहब अम्बेडकरजी का नाम लेने का भी अधिकार नहीं है। उन्होंने जीवन भर उनका अपमान किया। अम्बेडकर को दोनों लोकसभा चुनाव में हराने का काम कांग्रेस ने ही किया था।
भवानजी ने कहा कि आंबेडकर को संविधान समिति में कांग्रेस ने नहीं भेजा था. कांग्रेस नहीं चाहती थी कि आंबेडकर 1946 में बंबई से प्रांतीय चुनाव जीत जाएं. हुआ भी ऐसा ही. इस हार के साथ ही संविधान सभा का हिस्सा बनने की आंबेडकर की संभावना कम हो गई थी.
आंबेडकर को संविधान सभा में शामिल करने के पीछे का श्रेय दरअसल उनके मित्र जोगिंदर नाथ मंडल को जाता है. जेएन मंडल उन दिनों अविभाजित बंगाल की सरकार में मंत्री हुआ करते थे. जब आंबेडकर संविधान सभा में निर्वाचन न पा सके, मंडल ने आंबेडकर को प्रतिष्ठित 296 सदस्यीय संविधान सभा के लिए निर्वाचित करवाया था.
उन्होंने बताया कि भारत की संविधान सभा 16 मई 1946 को कैबिनेट मिशन योजना के तहत लागू हुई थी. संविधान सभा के सदस्यों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल, हस्तांतरणीय-वोट प्रणाली के तहत प्रांतीय विधानसभाओं द्वारा चुना गया था. 1946 में बंगाल विधानसभा के चुनाव में कुल 250 सीटों में मुस्लिम लीग को 113 और कांग्रेस को 86 सीट मिली थीं. इसी बंगाल की विधानसभा ने आंबेडकर को संविधान सभा के लिए चुना था.
गौरतलब है कि विभाजन के बाद जेएन मंडल पाकिस्तान चले गए जहां वे मुस्लिम लीग सरकार में न्यायिक, विधायी, निर्माण और भवन मंत्री भी थे. वे पाकिस्तान की सरकार में कानून मंत्री और पाकिस्तान संविधान सभा के अध्यक्ष बने. लेकिन बहुत जल्द पाकिस्तान के इस सह-संस्थापक को निराश होकर भारत वापस आना पड़ा.
उन्होंने कहा कि कांग्रेसी बताएं कि क्या उन्होंने आंबेडकर को संविधान सभा में जाने से नहीं रोका था और उन्हें अपने गृह-राज्य से बहुत दूर जाकर बंगाल से संविधान सभा में प्रवेश लेना पड़ा था. यह विडंबना है कि कांग्रेस इतिहास के इस पहलू को नहीं स्वीकारना चाहती.

